पटना में खाकीवर्दी का नंगा नाच, छात्रों को छुड़ाने गए दो वकीलों को ही पुलिस ने हथकड़ी लगाकर परेड कराया

पटना। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की बिहार ईकाई ने पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आकाश केशव और कोलकाता विश्वविद्यालय से विधि स्नातक, समाजसेवी एवं स्वतंत्र फिल्म निर्माता/निर्देशक व्रती कुमार को अवैध रूप से हिरासत में लिए जाने की निंदा की है। संगठन का कहना है कि पटना पुलिस ने न केवल उनको गिरफ्तार किया बल्कि उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया। आपको बता दें कि ये दोनों शख्स पीयूसीएल से भी जुड़े हुए हैं। 

पूरे घटनाक्रम का व्यौरा देते हुए संगठन ने बताया कि 26 जुलाई, 2026 को आयोजित अपनी बैठक में यह निर्णय लिया कि नीट (NEET) छात्र आंदोलन के सिलसिले में पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए या गिरफ्तार किए गए विद्यार्थियों को कानूनी सहायता प्रदान की जाएगी। आकाश केशव और व्रती कुमार, दोनों पी.यू.सी.एल. के विधिक सहायता दल के सदस्य थे। रविवार, 26.07.2026 की रात्रि जब वे हिरासत में लिए गए विद्यार्थियों की स्थिति और कुशलक्षेम जानने के लिए गांधी मैदान थाना पहुँचे, तो उन्हें बताया गया कि हिरासत में लिए गए छात्रों को एसडीजेएम के समक्ष छज्जू बाग़ में पेश किया जा रहा है। जिसके बाद वे एसडीजेएम के छज्जू बाग़ स्थित आवास पर पहुँचे।

छज्जू बाग़ स्थित एसडीजेएम के आवास पर क्या हुआ?

प्रारंभ में आकाश केशव और व्रती कुमार ने कुछ समय तक खुली अदालत की कार्यवाही देखी। जब उन्होंने पाया कि विद्यार्थियों को उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही न्यायिक हिरासत में भेजा जा रहा है, तो उन्होंने न्यायालय के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई। किसी भी विद्यार्थी को उनके विरुद्ध विशिष्ट आरोपों की जानकारी नहीं दी गई थी। उन्हें प्राथमिकी (एफ.आई.आर.) की प्रति भी उपलब्ध नहीं कराई गई थी, जो उनके मौलिक विधिक अधिकारों का उल्लंघन था।  संगठन ने बताया कि अधिवक्ता आकाश केशव, जो वकील की पोशाक में थे, ने माँग की कि हिरासत में लिए गए लोगों को एफ.आई.आर. की प्रति दी जाए, उनके बयान विधिवत दर्ज किए जाएँ, और न्यायालय की कार्यवाही भी रिकॉर्ड की जाए। 

संगठन का कहना है कि इन आपत्तियों और माँगों का न्यायालय-कक्ष में उपस्थित पुलिसकर्मियों तथा सादी वर्दी में मौजूद व्यक्तियों ने शत्रुतापूर्ण ढंग से विरोध किया। गांधी मैदान थाने के थानाध्यक्ष अखिलेश कुमार मिश्रा, ने प्रतिशोधात्मक ढंग से घोषणा की कि चूँकि वे आंदोलन के दौरान घायल हुए थे, इसलिए एसडीजेएम के समक्ष प्रस्तुत सभी विद्यार्थियों को दंड स्वरूप जेल भेजा जाना चाहिए। अधिवक्ता आकाश ने विनम्रतापूर्वक कहा कि यद्यपि उन्हें थानाध्यक्ष की चोटों पर सहानुभूति है, तथापि यह विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से दंडित करने का आधार नहीं बन सकता।

श्वास परीक्षण, बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 37 तथा भा.न्या.सं. (बी.एन.एस.) की धारा 132 का आरोपण

पीयूसीएल का कहना है कि जब अधिवक्ता आकाश केशव, न्यायालय के एक अधिकारी के रूप में, हिरासत में लिए गए विद्यार्थियों की ओर से अपनी दलीलें पेश कर रहे थे, तो पुलिसकर्मी बेहद आक्रामक हो गए और उन्होंने अधिवक्ता आकाश केशव, व्रती कुमार तथा वहाँ उपस्थित अन्य अधिवक्ताओं को घेर लिया। गांधी मैदान थाने के थानाध्यक्ष ने आकाश केशव को धमकी दी कि अगर उन्होंने विद्यार्थियों की ओर से आपत्तियाँ उठाना बंद नहीं किया तो उन पर मुकदमा चलाया जाएगा।

जब आकाश केशव नहीं झुके, तो थानाध्यक्ष मिश्रा ने परिसर के दरवाज़े बंद करवा दिए और —मजिस्ट्रेट के किसी निर्देश या अनुमति के बिना — एक श्वास विश्लेषक (ब्रेथ एनालाइज़र) मँगवाया और आकाश केशव तथा व्रती कुमार दोनों को मौके पर ही परीक्षण देने हेतु विवश किया, जबकि उस उपकरण का न तो अंशांकन (कैलिब्रेशन) किया गया था और न ही परीक्षण किया गया था, और बाद में कोई रक्त या मूत्र पुष्टिकरण परीक्षण भी नहीं कराया गया। मात्र इसी श्वास विश्लेषक की रीडिंग के आधार पर, थानाध्यक्ष, गांधी मैदान ने आकाश केशव और व्रती कुमार दोनों को हिरासत में ले लिया। उन्हें उपस्थित मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने से वंचित रखा, और वहां से सीधे कोतवाली थाना ले जाया गया, जहाँ उन्हें रात भर हिरासत में रखा गया। 

संगठन के पदाधिकारियों ने बताया कि थानाध्यक्ष, गांधी मैदान ने स्वयं, कोतवाली थाना के एक कर्मचारी की सहायता से खुद ही कोतवाली थाना में गिरफ्तारी ज्ञापन (अरेस्ट मेमो) तैयार किया और आकाश केशव तथा व्रती कुमार से उस पर हस्ताक्षर करने को कहा। जब उन्होंने एफआईआर की प्रति माँगी, तो उसे देने से साफ़ इनकार कर दिया गया। संगठन का कहना है कि इस बात से यह स्पष्ट होता है कि पुलिस अधिकारियों को विधि की सम्यक प्रक्रिया का कोई सम्मान नहीं था और उन्होंने जानबूझकर संगठन के दोनों सदस्यों, जो मानवाधिकार रक्षक हैं, को एक झूठे मामले में फँसा दिया गया।

हथकड़ी लगाना और अंततः पीआर बॉन्ड पर रिहाई

अगली सुबह, 27 जुलाई को, उन्हें हथकड़ी लगाकर निकटवर्ती अस्पताल ले जाया गया, वहाँ उनकी जाँच कर उन्हें स्वस्थ घोषित किया गया, और उसके बाद फिर से हिरासत में ले लिया गया। अस्पताल में भी उनके मूत्र और रक्त के नमूने नहीं लिए गए। हथकड़ी हटाने के बार-बार अनुरोध के बावजूद, उन्हें पहले थाने के भीतर, फिर अस्पताल में, और बाद में लगभग दोपहर 2:00 बजे पटना सिविल कोर्ट परिसर से होकर, सार्वजनिक रूप से हथकड़ी पहनाकर घुमाया गया — जो माननीय उच्चतम न्यायालय और माननीय उच्च न्यायालय द्वारा हथकड़ी के प्रयोग पर स्थापित दिशा-निर्देशों के विपरीत है। आपको बता दें कि इसके प्रयोग की अनुमति केवल असाधारण परिस्थितियों में है। न कि नियमित रूप से या फिर किसी अभियुक्त को अपमानित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए। हथकड़ियाँ तभी हटाई गईं जब न्यायालय परिसर में उपस्थित विधिक बिरादरी के सदस्यों ने हस्तक्षेप कर आपत्ति जताई।

संगठन ने बताया कि आकाश केशव और व्रती कुमार दोनों को विशेष न्यायाधीश (उत्पाद) के सामने पेश किया गया। लोक अभियोजक तथा आकाश केशव एवं व्रती कुमार के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद, न्यायाधीश ने उन्हें व्यक्तिगत मुचलके (पी.आर. बॉन्ड) पर रिहा कर दिया और उन्हें हथकड़ी पहनाने के लिए कोतवाली थाना के अनुसंधान पदाधिकारी (आईओ) को फटकार लगाई।

छवि धूमिल करने के लिए मीडिया का दुरुपयोग

पीयूसीएल ने इस बात पर चिंता जताई है कि उनकी रिहाई के पश्चात, पुलिस ने आकाश केशव और व्रती कुमार के गिरफ्तारी ज्ञापन (अरेस्ट मेमो) की तस्वीरें मीडिया को जारी कीं और थानाध्यक्ष, कोतवाली थाना ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया को बयान दिए, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी समाचार रिपोर्ट्स और वीडियो सामने आए जिनमें उन्हें नशे में होने और एक महिला न्यायिक अधिकारी के साथ दुर्व्यवहार करने के रूप में प्रस्तुत किया गया। पीयूसीएल का कहना है कि वह इसे उन दो व्यक्तियों की छवि को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण ढंग से धूमिल करने का प्रयास मानता है, जो हिरासत में लिए गए छात्रों के विधिक अधिकारों की रक्षा करने का वैध कर्तव्य निभा रहे थे। यह न्यायालय की कार्यवाही के दौरान पुलिस द्वारा विधि की सम्यक प्रक्रिया के उल्लंघन से ध्यान भटकाने का प्रयास है।

पी.यू.सी.एल. ने इस मौके पर कुछ चीजें स्पष्ट करते हुए कहा कि

  • प्रत्येक हिरासत में लिए गए व्यक्ति को, जिसमें नाबालिग और विद्यार्थी भी शामिल हैं, विधि के अंतर्गत यह अधिकार है कि उसे उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जानकारी दी जाए और बिना विलंब एफ.आई.आर. की प्रति उपलब्ध कराई जाए।
  • किसी भी पुलिस अधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी अधिवक्ता या समाजसेवी को हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की ओर से खुली अदालत में वैध दलीलें प्रस्तुत करने पर हिरासत में ले, बाध्य करे या डराए-धमकाए। न्याय के इस उपहास में, जहाँ थानाध्यक्ष, गांधी मैदान पर न्यायालय के एक अधिकारी (इस मामले में अधिवक्ता आकाश केशव) को उनके कर्तव्य-निर्वहन में बाधा डालने हेतु भा.न्या.सं. की धारा 132 लगाई जानी चाहिए थी, वहाँ उलटे अधिवक्ता आकाश केशव और व्रती कुमार को ही पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया गया।
  • किसी नागरिक पर, न्यायालय परिसर के भीतर न्यायालय की अनुमति के बिना तथा सम्यक प्रक्रिया (जिसमें अंशांकन एवं पुष्टिकरण परीक्षण शामिल हैं) का पालन किए बिना, श्वास विश्लेषक या किसी अन्य परीक्षण का प्रयोग करना, और उसके आधार पर हिरासत में लेना, पूर्णतः अवैध है।
  • विधि में मान्यता प्राप्त विशिष्ट परिस्थितियों के अभाव में, किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थानों पर हथकड़ी पहनाकर घुमाना, न्यायिक दिशा-निर्देशों का उल्लंघन तथा मानवीय गरिमा के विरुद्ध है।
  • पुलिस द्वारा उनकी तस्वीर तथा एकपक्षीय, असत्यापित विवरण मीडिया को जारी करना जानबूझकर जनमत को उनके विरुद्ध प्रभावित करने के उद्देश्य से किया गया। यह न केवल प्रक्रियागत औचित्य का उल्लंघन है, बल्कि दोषसिद्ध होने तक निर्दोष माने जाने के व्यक्ति के अधिकार का भी उल्लंघन है।

पी.यू.सी.एल. ने माँग की है कि:

  • आकाश केशव और व्रती कुमार के विरुद्ध दर्ज की गई एफ.आई.आर. को रद्द किया जाए।
  • 26 जुलाई की रात्रि घटित घटना में थानाध्यक्ष, गांधी मैदान थाना, तथा अन्य संलिप्त पुलिसकर्मियों के आचरण की स्वतंत्र जाँच की जाए, जो माननीय पटना उच्च न्यायालय की निगरानी में हो।
  • अवैध हिरासत, न्यायिक अनुमति के बिना बलपूर्वक परीक्षण, हथकड़ी के अनधिकृत प्रयोग, तस्वीरें लीक करने, मीडिया को गैर-जिम्मेदाराना बयान देने, तथा आकाश केशव और व्रती कुमार को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

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